कभी भी किसी से भी हो जाती है।
प्यार अक्सर सूरत देख कर होता है,
लेकिन दोस्ती का आलम ही अलग है जनाब,
ये सीरत देख कर हो जाती है।
दोस्ती निभाना अगर उतना आसान होता
जितना करना होता है,
तो शायद नजराने कुछ और होते।
लोग शायद उतने दुखी न होते।।
जिम्मेदारियों की भीड़ में अक्सर
दोस्ती नजरंदाज हो जाती है,
बचपन के दोस्त इस भीड़ में कही पीछे छूट जाते हैं
"हर महीने कम से कम एक बार मिलेंगे"
ऐसा बोल कर हम अक्सर भूल जाते हैं,
भूल जाते हैं या career की tension
भूलने को मजबूर कर देती है,
अब तो वो यादें देखने को
Gallery भी महीनो में एक बार खुलती है।।
School खत्म होने पर महसूस होता है
की हर कोई हमारा दोस्त नहीं था
किसी का हम timepass थे
कोई हमारे वक्त गुजारने का जरिया था।
यही तो मासूमियत है दोस्ती की,
जब चल रही होती है, तब वक्त का पता नहीं चलता
और जब खत्म हो जाती है...................
दोस्ती हमेशा लड़ाई झगड़े से खत्म नहीं होती
कभी कभी यूं ही बात बंद हो जाती है
कुछ कारण नहीं होता,
बस बात बंद हो जाती है।।
No comments:
Post a Comment